भाखड़ा ब्यास प्रबन्ध बोर्ड

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भाखड़ा परियोजना

भाखडा-नंगल बांध परियोजना का विकासात्‍मक इतिहास

भाखडा नंगल परियोजना में कुछ आश्‍चर्यजनक है, कुछ विस्‍मयकारी है, कुछ ऐसा है जिसे देखकर आपके दिल में हिलोरें उठती हैं। भाखडा पुनरूत्थित भारत का नवीन मन्दिर है और यह भारत की प्रगति का प्रतीक है।

-जवाहर लाल नेहरू

संक्षिप्‍त इतिहास

सतलुज नदी पर संचयन जलाशय के निर्माण का विचार पहली बार सर-लूडस डैने द्वारा 8 नवम्‍बर, 1908 की टिप्‍पणी में उत्‍पन्‍न हुआ जिसमें संचयन तथा विद्युत विकास के लिए बांधों हेतु सुनि और बाबू जॉर्ज का अनुकूल स्‍थल बताया। इस प्रस्‍ताव पर विस्‍तृत रिर्पोट मार्च 1919 में प्रस्‍तुत की गई यद्यपि परियोजना की अनुमानित लागत उत्‍साहवर्धक नहीं थी। अत: परियोजना को स्‍थगित कर दिया गया।

1919 की परियोजना रिर्पोट

सतलुज नदी पर बांध बनाने का प्रस्‍ताव तत्‍कालीन मुख्‍य अभियन्‍ता, श्री एफ.ई. वैदर ने दिनांक 20 फरवरी, 1915 की टिप्‍पणी में पुन: रखा गया। इस टिप्‍पणी के आधार पर भाखडा पर एक ऊंचा बांध बनाने के लिए पहली विस्‍तृत ओर व्‍यापक रिर्पोट 1919 में तैयार की गई।

1919 की परियोजना रिर्पोट में अत्‍यधिक बहाव के दौरान सतलुज के अनुपयोगी जल को इक्‍टठा करने का प्रावधान किया गया तथा इसमें मुख्‍यत: निम्‍नलिखित चार बड़े कार्य शामिल किए गए:

  • भाखडा बांध
  • ऊपरी सरहिन्‍द नहर
  • निचली सरहिन्‍द नहर
  • पश्चिमी यमुना नहर का विस्‍तार

प्रस्‍तावित बांध की ऊचाई 120.40 मीटर (395 फुट) होनी थी और यह रोपड़ से लगभग 69 कि.मी. (43मील) दूर लगभग उसी स्‍थान पर बनाया जाना था जहां वर्तमान बांध बनाया गया है। इसमें 3182.38 मिलियन एम 3 (2.58 मिलियन एकड़ फीट) के अधिकतम भण्‍डारण की व्‍यवस्‍था की गई। योजना में बांध में ठोस मैसनरी ग्रैविटी सैक्‍शन शामिल था और उस समय यह विश्‍व में सबसे ऊंचा बांध होना था। परियोजना में किसी जल विद्युत अधिष्‍ठापन की व्‍यवस्‍था नहीं की गई थी और यह एक सिंचाई परियोजना थी। यह परियोजना भारतीय भू-सर्वेक्षण विभाग भू-वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा समार्पित थी।

तथापि 1919 की परियोजना कभी भी कार्यान्वित न हो सकी तथा 1919 में स्‍वीकृत सतलुज घाटी परियोजना के पक्ष में इसे ताक पर रख दिया गया।

1920-1938 के दौरान परियोजना का प्रस्‍ताव 1919 परियोजना पर यद्यपि आगे कार्य नहीं हुआ, किन्‍तु इसके परिणामस्‍वरूप विख्‍यात भू-वैज्ञानिकों तथा अभियन्‍ताओं द्वारा भाखडा जोर्ज के कई जांच तथा परीक्षण किए गए। दिसम्‍बर 1924 में, अटॉक ऑयल कम्‍पनी के मुख्‍य भू-वैज्ञानिक ने स्‍थल का निरीक्षण किया और उनकी सिफारिशों के आधार पर बांध स्‍थल पर अनवेदर्ड रॉक को प्रकट करने के लिए गर्मी में बाढ़ के स्‍तर के ऊपर नदी के दोनो किनारों पर ड्रिफटस की खुदाई की गई। 1925 में एक भारतीय भू-सर्वेक्षण के अधीक्षक भू-वैज्ञानिक ने खाली पड़ी परत का सूक्ष्‍म परीक्षण किया और प्रस्‍तावित बांध के भू-वैज्ञानिक पहलुओं पर अपनी रिर्पोट प्रस्‍तुत की । 1927 में, यू. एस. ब्‍यूरों ऑफ रिक्‍लेमेशन एण्‍ड संयुक्‍त राज्‍य सिंचाई सेवा के परामर्शी अभियन्‍ता श्री ए.जी. विली, अटॉक ऑयल कम्‍पनी के मुक्ष्‍य भू-वैज्ञानिक डॉ. ई.एस. पिनफोल्‍ड तथा पंजाब सिंचाई सेवा के परामर्शी अभियन्‍ता श्री डब्‍लयू. एच. निकोलसन की एक सीमिति बनाई गई जिसे यमुना ओर चिनाव नदियों के बीच प्रस्‍तावित भाखडा बांध स्‍थल तथा अन्‍य सम्‍भांवित भण्‍डार स्‍थलों पर अपनी रिर्पोट प्रस्‍तुत करनी थी। सीमिति ने नवम्‍बर, 1927 में भाखडा स्‍थल का निरीक्षण किया, ओर उनकी रिर्पोट ने, 1919 की परियोजना में पूर्व प्रस्‍तवित 120.40 मी. (395 फुट) उंचे बांध की अपेक्षा 152.40 मी. (500 फुट) ऊंचा बांध बनाने की उपयुक्‍तता की ओर सुस्‍पष्‍ट रूप से ध्‍यान दिलाया। 1932 में, 152.40 मी. (500 फुट) ऊंचे बांध के लिए जलाशय क्षेत्र हेतु सर्वोक्षण किया गया।

1939-42 की परियोजना रिर्पोट

1939 में, तत्‍कालीन अधीक्षण अभियन्‍ता, परियोजना, परिमण्‍डल डॉ. ए.एन. खोसला द्वारा 152.40 मी. (500 फुट) ऊंचें बांध के लिए एक विस्‍तृत परियोजना रिर्पोट तैयार की गई । इस परियोजना में अधिकतम भण्‍डारण ई.एल. 487.68 मी. (1,600 फुट) पर 5859 मिलियन एम 3 (4.75 मिलियन एकड फीट) के भण्‍डारण वाले 152.40 मी. (500 फुट) ऊंचे स्‍ट्रेट ग्रेविटी कंकरीट बांध का विचार किया गया था। बांध की ऊंचाई उस समय उपलब्‍ध भू-वैज्ञानिक विस्‍तृत सूचना पर आधारित थी । परियोजना में रूपांकन के विभिन्‍न महत्‍वपूर्ण पहलुओं जैसे बांध स्‍थल की सीजमिसिटीए जलाशय की सिलटिंग, निर्माण के दौरान नदी का डाइवर्जन, स्पिलवे क्षमता की पर्याप्‍तता, नींव तथा अंत्‍याधर की तैयारी, कंकरीट की प्‍लेसिंग इत्‍यादि को कवर किया तथा पहली बार जल वैद्युत विकास हेतु प्रावधान किया गया था। आंकलन में चार यूनिटों, प्रत्‍येक 40 मेगावाट के साथ-साथ 40 मेगावाट की ही एक पांचवी अतिरिक्‍त यूनिट का प्रावधान किया गया था। 1944 में पंजाब सरकार द्वारा यूनाईटिड स्‍टेटस ब्‍यूरो आफ रिक्‍लेमेशन के तत्‍कालीन मुख्‍य अभियन्‍ता डॉ. जे.एल. सेवेज से स्‍थल की जांच करने का अनुरोध किया गया और ई एल. 487.68 मी. (1,600 फुट) पर अधिकतम जलाशय स्‍तर सहित एक बांध के निर्माण की सम्‍भाव्‍यता पर रिर्पोट प्रस्‍तुत करने को कहा गया। उन्‍होने सिफारिश की कि बांध स्‍थल इस उददेश्‍य के लिए उपयुक्‍त है तथा उन्‍होने नींव ओर अत्‍याचार की आगे छानबीन करने का सुझाव दिया। वर्ष 145-47 के दौरान यह कार्य अमेरिका के अत्‍यधिक अनूभवी भू-वैज्ञानिक डॉ. एफ.ए. निकेल की देखरेख में किया गया। जिन्‍होंने बाद के रूपांकन कार्यों हेतु विस्‍तृत भू-वैज्ञानिक सूचना उपलब्‍ध कराई। प्रारम्भिक छानबीन के दौरान कुल मिलाकर 58 छिद्र ड्रिल किए गए। जिनकी अनुमानित लम्‍बाई 2,134 मीटर थी। तथापि, परियोजना के अनुमोदन उपरान्‍त आगे की छानबीन 1955 तक जारी रही, ताकि क्षेत्र के भू-वैज्ञानिक लक्ष्‍णों को अन्तिम रूप से ठीक-ठीक स्‍थापित किया जा सके तथा फाऊंडेशन ट्रीटमेंट स्‍कीम का उपाय किया जा सके। सब सरफेस जांच पूर्ण करने के लिए कोर ड्रिलिंग का लगभग 12,802 मी. का कार्य किया गया। इसके अतिरिक्‍त सब सस्‍फेस भू-वैज्ञानिक की जानकारी बढ़ाने के लिए तथा उपलब्‍ध रॉक की जांच करने हेतु 1.21 कि.मी. ड्रिफटस की खुदाई की गई ।

1945-46 की परियोजना रिर्पोट

1945-46 में, अन्‍तर्राष्‍ट्रीय का. डेनवेर, यू.एस.ए. द्वारा ई. एल. 481.58 मी. (1,580 फुट) पर अधिकतम जलाशय स्‍तर पर सहित स्‍पैसिफिकेशन डिजाइनें तैयार की गयी। पंजाब सरकार तथा बिलासपुर के राजा के बीच 1945 के ड्रॉफट बिलासपुर समझौते द्वारा अधिकतम जलाशय उन्‍नयन की सीमाबद्धता आरोपित की गई थी।

1939-42 परियोजना, 1945-46 के सुदृढ़ विद्युत अध्‍ययन तथा विशेषज्ञों की विभिन्‍न रिपोर्टों पर आधारित इस डिजाइन में ड्रम गेट स्पिलवे सहित एक सीधे गुरूत्‍तव बांध जिसका शीर्ष ई.एल. 487.68 मीटर (1,600 फुट) था, वाले एक टनल स्पिलवे, नदी निर्गम, सुरंग निर्गम कार्यों तथा 150 मेगावाट की एक सुदृढ़ विद्युत अधिष्‍ठापन की व्‍यवस्‍था की गई थी।

1948-51 के दौरान परियोजना का अन्तिम प्रस्‍ताव

1948 में, जब भारतीय क्षेत्र वाले विभाजित राज्‍य की सिंचाई एवं बिजली की मांगे ओर बढ़ी तो बांध की ऊंचाई का प्रश्‍न, उसका शीर्ष उन्‍नयन जो बिलासपुर करबे को जलमग्‍न होने से बचाने के लिए केवल ई.एल. 487.68 मीटर (1,600 फुट) पर निश्चित किया गया था, की समीक्षा की गई थी तथा तथा फाउंडेशन रॉक स्थितयों द्वारा यथा निर्धारित अधिकतम सुरक्षित अनुकूल आवश्‍यक जल शक्ति अध्‍ययनों तथा आगे फांउडेशन की छानबीन के उपरान्‍त 1948 में ईएल 512.06 मीटर (1,680 फुट) पर पूर्ण जलाशय स्‍तर सहित इसकी अनुकूलतम ऊंचाई तक बांध को ऊपर उठाने का निर्णय लिया गया, बाद में इसे आगे ईएल 513.58 मीटर (1,685 फुट) तक ऊपर उठाया गया।

पंजाब के लोक निर्माण विभाग (पी.डब्‍लयू.डी.) की सिंचाई शाखा तथा अन्‍तर्राष्‍ट्रीय कम्‍पनी क्ष्‍दड़ यू.एस.ए. के बीच दिनांक 14 नवम्‍बर 1948 को किए गए एक समझौते के माध्‍यम से उच्‍चतर बांध के लिए संशोधित डिजाइन तथा विनिर्देशन अन्‍तर्राष्‍ट्रीय कम्‍पनी क्ष्‍दड यू.एस.ए.को पुन: सौपे गए।

207.26 मी.(680 फुट) ऊंचे सीधे गुरूत्‍तव बांध के लिए 1951 में, संशोधित परियोजना रिर्पोट तैयार की गई।

अन्तिम परियोजना प्रस्‍ताव में निम्‍नलिखित यूनिटें सम्मिलित थी :-

  • भाखडा बांध तथा विद्युत संयंत्र
  • नंगल बांध
  • नंगल हाईडल चैनल
  • नंगल हाईडल चैनल पर गंगूवाल तथा कोटला विद्युत गृह
    • रोपड़ हैडवर्क्‍स का पुननिर्माण
    • सरहिन्‍द नहर का पुननिर्माण
  • भाखडा नहरें
  • बिस्‍ट दोआब नहर
  • विद्युत ऊर्जा की पारेषण और वितरण प्रणाली
  • भाखडा क्षेत्र की मार्केट तथा संचार का विकास

अतएव: उपरोक्‍त प्रस्‍ताव के साथ, भाखडा नंगल परियोजना ने एक वास्‍तविक बहुउददेशीय परियोजना का रूप लिया। इसके मुख्‍य लाभों के रूप में सिंचाई तथा विद्युत उत्‍पादन और आकस्मिक लाभों के रूप में बाढ नियंत्रण, मनोरंजन तथा मत्‍स्‍य संस्‍कृति की सुविधांए प्राप्‍त हुई।

भाखडा नंगल परियोजना के निर्माण हेतु भाखडा नियंत्रण बोर्ड–एक एजेन्‍सी का गठन हुआ। 1947 में स्‍वतन्‍त्रता के बाद पंजाब के दो विख्‍यात अभियन्‍ताओं डॉ. ए.एन. खोसला तथा इंजी. कंवर सैन ने भाखडा बांध के त्‍वरित निर्माण की अत्‍यावश्‍यकता हेतु निर्माण कार्य, खान एवं विद्युत केन्‍द्रीय मन्‍त्री श्री एन.वी. गेडगिल के माध्‍यम से भारत सरकार पर दबाव डालने के अपने प्रयास जारी रखें।

एक डिबेट की गई कि बांध किसे बनाना चाहिए। क्‍या भारतीय अभियन्‍ताओं के पास विस्‍तृत परिणाम तथा तकनीकी जटिलताओं वाले बांध का निर्माण करने के लिए अपेक्षित निपुणता तथा अनुभव है। क्‍या वे इसे अकेले बना सकेंगे। क्‍या बांध लोक निर्माण विभाग द्वारा बनाया जा सकता है। ये डॉ. ए.एन. खोसला थे जिन्‍होंने इस समस्‍या को पूरी योग्‍यता तथा अपनी दूरदृष्टि से समझा तथा इस सम्‍बन्‍ध में तीन मौलिक नीतियां निर्धारित की। पहली उन्‍होंने जोरदार अपील की कि बांध विदेशी विशेषज्ञों के मार्ग-दर्शन में पी.डब्‍ल्‍यू.डी. द्वारा बनाया जाना चाहिए। दूसरी नीति थी कि भारत सरकार को ऐसे विस्‍मयकारी बांध जिसका भारत में अभी तक निर्माण नहीं हुआ है, के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। तीसरी चूंकि यह मामला अन्‍तर्राज्‍तीय महत्त्‍व के भाग का है और मुख्‍य रूप से इसका उददेश्‍य तीन राज्‍यों नामत: पंजाब, पैप्‍सु तथा राजस्‍थान को जल की पूर्ति करने का है इसके लिए बांध की ऊंचाई लगभग 100 फुट बढाई जानी चाहिए।

अत: परियोजना की प्रगति का निरीक्षण तथा मॉनीटर करने के लिए भाखडा नियन्‍त्रण बोर्ड, एक एजेन्‍सी का गठन किया गया। इस संगठन में केन्‍द्रीय सरकार, पंजाब सरकार, पैप्‍सु तथा राजस्‍थान सरकार के प्रतिनिधि सम्मिलित थे :-

  • पंजाब का राज्‍यपाल................अध्‍यक्ष
  • सचिव, वित मंत्रालय, भारत सरकार.............उपाध्‍यक्ष
  • अध्‍यक्ष, केन्‍द्रीय जल एवं विद्युत आयोग भारत सरकार.......सदस्‍य
  • विभिन्‍न राज्‍य सरकारों के सचिव-सिंचाई एवं विद्युत इन्‍चार्ज तथा वित्‍त सदस्‍य भी।
  • सभी मुख्‍य अभियन्‍ता-निर्माण प्रभारी.......सदस्‍य
  • संयुक्‍त सचिव, वित मंत्रालय, भारत सरकार........सदस्‍य

तत्‍पश्‍चात 1952 में डॉ. ए.एन. खोसला की अध्‍यक्षता में बोर्ड ऑफ कान्‍सयूलेंटस की स्‍थापना भी की गई।

1951-1963 के दौरान भाखडा नंगल परियोजना की निर्माण चरण :

प्रारिम्‍भक वर्षो में भाखडा पर परियोजना ले आऊट एवं निर्माण की कार्य स्थितियां भयावह थी। रेल हैड, जो नंगल से लगभग 60 कि.मी. दूर रोपड़ (पंजाब) तक जाती थी, का 1946 में नंगल तक विस्‍तार किया गया। स्‍वतन्‍त्रता से पूर्व नंगल से रोपड़ तक शायद ही कोई ऐसी सड़क थी जिसका 1947 में नंगल तक विस्‍तार प्राम्‍भ किया गया हो। आवश्‍यक संरचना 1948 के पश्‍चात ही धीरे-धीरे होनी प्रारम्‍भ हुई। 1951 में नंगल में 50 बिस्‍तर वाला केवल एक अस्‍पताल बनाया गया, जो अपनी प्रकार का पहला अस्‍पताल था।

भारतीय योजनाकारों और अभियन्‍ताओं द्वारा दो मुख्‍य महत्‍वपूर्ण निर्णय लिए गए। पहला निर्णय, भाखडा बांध की अपेक्षा पहले भाखडा नहर प्रणाली निर्मित करने का था तथा दूसरा निर्णय विदेशी विशेषज्ञों की सहायता से विभागीय रूप में बांध का निर्माण करना था। यद्यपि यू.एस.बी आर भाखडा बांध का डिजाइन सलाहकार था फिर भी इसका क्रियावयन सिंचाई विभाग के भारतीय अभियन्‍ताओं के हाथ में आया। अप्रैल, 1952 के पश्‍चात जब मि. एम. हारवे स्‍लोकम अमेरिका से निर्माण तकनीशियनों तथा अभियन्‍ताओं की अपनी टीम के साथ आए तो इसका पूर्ण रूप से सक्रिय निर्माण कार्य प्राम्‍भ हुआ।

बांध से पहले भाखडा नहर प्रणाली को बनाने का निर्णय पूर्णतया: साहसिक, काल्‍पनिक तथा नि:सन्‍देह लाभकारी था। यह नदी घाटी परियोजना के इतिहासक घटना रहेगी। इस कदम का मुख्‍य श्रेय ई. कंवर सैन, केन्‍द्रीय जल एवं विद्युत आयोग के सदस्‍य को जाता है। यह निर्णय लिया गया कि नहर प्रणाली को शीघ्र पूरा करने के लिए पर्याप्‍त निधि जुटाने के प्रयास किए जाए, ताकि किसानों को यथाशीघ्र बारहमासी जल की सप्‍लाई उपलब्‍ध हो सके। ऐसी नीति के तत्‍काल अनुमोदन एवं त्‍वरित क्रियान्‍वयन के परिणामस्‍वरूप भाखडा नहर प्रणाली का कार्य शीघ्र पूरा हुआ जिसका उदघाटन 7 जुलाई, 1954 को प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू द्वारा किया गया।

पण्डित नेहरू को भाखडा पर अत्‍यधिक गर्व था। उन्‍होने इसके निर्माण के दौरान परियोजना का 10 बार दौरा किया। नए भारत के निर्माण के प्रति उत्‍साह एवं उमंग से भरपूर सभी अभियन्‍ताओं तथा तकनीशियनों ने लगभग 10 वर्षो तक दिन-रात अधिक प्रयास करके भाखडा बांध बनाने में झौंक दिए। पण्डित नेहरू ने 22 अक्‍तूबर, 1963 को बांध राष्‍ट्र को समर्पित किया।

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